मेरे प्यारे दोस्तो ,
ये कविता मैंने उन लोगो के लिए लिखी है , जो जरा सी परेशानियों से बहुत घबरा जाते है या हतोत्साहित हो जाते ह
मृत्यु से लड़ने चला,
तो ज़िंदगी से क्यों डरु मैं...
अश्रु पीकर जी रहा ,
संघर्ष से फिर क्यों डरु मैं ....
चल रहा एकल निरंतर,
कंटकों मे पग पड़े है ......
आहटे लगती भयंकर,
राह मे शोले पड़े है .....
तीक्ष्ण है उनकी ज़लन,
वो ज़लन ही तो काम की है ...
घट न पाए, यदि लगन ,
तो ज़िंदगी आराम की है .....
कष्टमय हो ज़िंदगी ,
तो प्रभु परीक्षा ले रहे...
हम करें बस बन्दिगी ,
दुःख पी रहे , प्रभु दे रहे ....
प्यार करते प्रभु उसी को ,
कष्ट मे जो जी रहा हो ....
मुस्कुरा कर जीना सीखो,
दुःख रहे या सुख रहा हो...
है प्रतीक्षित वो समय ,
जो चिर - प्रतीक्षित भी नही है....
हो चलेगी तब प्रलय,
क्या ये सुनिश्चित सी नही है ....
हर समय सुख को मचलना,
भी तो केवल भ्रांति है ......
काल के रुख को बदलना ,
ही प्रलय की भांति है .......
1 comment:
its a nice poem
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