Thursday, July 3, 2008

मेरे दीपक

मेरे दीपक
मधुर मधुर मेरे दीपक जल!
युग युग ूितिदन ूितक्षण ूितपल;
िूयतम का पथ आलोिकत कर!
सौरभ फै ला िवपुल धूप बन;
मृदल मोम ु -सा घुल रे मृद तन ु ;
दे ूकाश का िसंधु अपिरिमत,
ते रे जीवन का अणु गल-गल!
पुलक-पुलक मेरे दीपक जल!
सारे शीतल कोमल नूतन,
माँ ग रहे तुझको ज्वाला-कण;
िवश्वशलभ िसर धुन कहता "मैं
हाय न जल पाया तुझमें िमल"!
िसहर-िसहर मे रे दीपक जल!
जलते नभ में दे ख असंख्यक;
ःनेहहीन िनत िकतने दीपक;
जलमय सागर का उर जलता;
िवद्युत ले िघरता है बादल!
िवहं स-िवहं स मेरे दीपक जल!
िम के अंग हिरत कोमलतम ु ,
ज्वाला को करते हृदयंगम;
वसुधा के जड़ अंतर में भी,
बन्दी नहीं है तापों की हलचल!
िबखर-िबखर मेरे दीपक जल!
मेरे िनश्वासों से िततर ु ,
सुभग न तू बुझने का भय कर;
मैं अंचल की ओट िकये हँू ,
अपनी मृद पलकों से चंचल ु !
सहज-सहज मेरे दीपक जल!
सीमा ही लघुता का बन्धन,
है अनािद तू मत घिड़याँ िगन;
मैं दृग के अक्षय कोशों से -
तुझमें भरती हँ आँसू ू -जल!
सजल-सजल मेरे दीपक जल!
तम असीम तेरा ूकाश िचर;
खेलेंगे नव खेल िनरन्तर;
तम के अणु-अणु में िवद्युत सा -
अिमट िचऽ अंिकत करता चल!
सरल-सरल मेरे दीपक जल!
तू जल जल होता िजतना क्षय;
वह समीप आता छलनामय;
मधुर िमलन में िमट जाना तू -
उसकी उज्जवल िःमत में घुल-िखल!
मिदर-मिदर मेरे दीपक जल!
िूयतम का पथ आलोिकत कर!
पंथ होने दो अपिरिचत
पंथ होने दो अपिरिचत
ूाण रहने दो अके ला!
और होंगे चरण हारे ,
अन्य हैं जो लौटते दे शूल को संकल्प सारे ;
दखोती िनमार्ण ु -उन्मद
यह अमरता नापते पद;
बाँध दें गे अंक-संसृित से ितिमर में ःवणर् बेला!
दसरी होगी कहानी ू
शून्य में िजसके िमटे ःवर, धूिल में खोई िनशानी;
आज िजसपर प्यार िविःमत,
मैं लगाती चल रही िनत,
मोितयों की हाट औ, िचनगािरयों का एक मेला!
हास का मधु-दत भे जो ू ,
रोष की ॅूभंिगमा पतझार को चाहे सहे जो;
ले िमलेगा उर अचंचल
वेदना-जल ःवप्न-शतदल,
जान लो, वह िमलन-एकाकी िवरह में है दके ला ु !

1 comment:

Advocate Rashmi saurana said...

aachi kavita hai. aap agar blog ke new post me likhege to sahi rhega. aapko paresani nhin hogi. sabd bhi pure pure aayege.
aap apna word verification hata le taki humko tipani dene me aasani ho.